**मिथिलाक बात** बनल अष्टदल अड़िपन आँगन, माछ, मखान, पान अछि प्रचलित। चरण छूबि आशीश लैत छैथ, जतय बृद्ध केँ एखनहुँ धरि नित।

रविवार, 19 अप्रैल 2009

भ्रमित शब्द

सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र
समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।

भ्रमित शब्द

हेरा गेल छल हमर शब्द किछु
फेर आइ घुरिया क’ आयल।
बास भेलै नहि कतौ जगत मे
थाकि हारि क’ अपने आयल।
नुका गेल सब रही नीन्न मे
मोनक कागत सँ उड़िया क’।
केना ? कखन ? सब के ल’ भगलै
आन - आन भाषा फुसिया क’।
आतुर मोन उचटि क’ ताकय
बैसल बाट दूर धरि कखनो।
राति बिराति द्वार के खोलत
छी जागल अबेर धरि एखनो।
पसरल देखि हमर निर्धनता
भागि गेल छल सब उबिया क’।
खोजि रहल छल सुख जीवन केँ
भोग वासना मे बौआ क’।
अर्थ बाँटि सम्मान समेटब
छलै मोन मे इच्छा जागल।
मान प्रतिष्ठा के इजोत मे
भ्रमित भेल सबटा छल भागल।
शब्द अभागल चीन्हि सकल नहि
हम बताह कवि छी वसुधा मे।
बिसरि जाइत छी हम जीवन भरि
की अंतर छै गरल - सुधा मे।
नहि अछि लोभ अर्थ के हमरा
नहि चाही सम्मान जगत के।
निज भाषा केँ स्नेह,कलम सँ
निकलत धार रत्त अमृत के।
हम कविता सँ दिशा दैत छी
दृष्टिहीन व्याकुल समाज के।
जगा रहल छी जे अछि सूतल
गीत गावि क’ बिना साज के।
नहि छपतै कविता जनिते छी
पत्रा पत्रिाका के पन्ना मे।
छपतै नग्न देह नारी के
मुख्य पृष्ट ,अंतित पन्ना मे।
मुदा केना हम कलम छोड़ि क’
मौन भेल आँगन मे बैसू।
केना हेतै किछु व्यथा देखि क’
द्रवित मोन मे नहि किछु सोचू।
कोमल हृदय अपन अंतर सँ
प्रतिक्षण आगि उगलिते रहतै।
पढ़तै कियो लोक नहि तैयो
कलम हाथ केँ चलिते रहतै
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1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

हेरा गेल छल हमर शब्द किछु
फेर आइ घुरिया क’ आयल।

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