**मिथिलाक बात** बनल अष्टदल अड़िपन आँगन, माछ, मखान, पान अछि प्रचलित। चरण छूबि आशीश लैत छैथ, जतय बृद्ध केँ एखनहुँ धरि नित।

रविवार, 15 नवंबर 2009

चानक प्रेम

चानक प्रेम
नहि उतरल छल चान गगन सँ
छलै आइ भारी जिद ठनने।
जागि गेल छल प्रात निन्न सँ
उदयाचल सिन्दुर सन रँगने।
विश्मित पवन आँखि के मलि-मलि
देखि रहल छल दृष्य ठाढ़ भ’।
उगतै सुरुज चान जड़ि मरतै
आवि रहल छै किरण गाढ़ भ’।
मुशकि रहल छल चान, ठोर पर
छलै अपन स्नेहक शीतलता।
ताकि रहल छल बाट, मिलन कँे
छलै हृदय मे मधुर विकलता।
बनल नियम छै कालचक्र के
के जानत की हैत अशुभता।
के बाँचत, के भागत नभ सँ
हैत नष्ट किछु आइ अमरता।
प्रखर अग्नि सँ आइ सामना
करतै शीतल प्रभा चान केँ।
प्रेम समर्पण मे जीवन के
द’ देतै आहुति प्राण कँे।
अंग - अंग मे अग्नि पूँज सँ
फुटतै फोँका लाल-लाल भ’।
काँच देह नहि सहतै पीड़ा
सुन्दरता जड़तै सुडाह भ’।
पलक झपकिते घटित भेल किछु
सुखद् दृष्य नभ केँ प्राँगन मे।
शीश झुकौने सुरुज चान केँ
बाँधि लेलक निज आलिंगन मे।
भेल चान परितृप्त अंक मे
पूर्ण भेलै मोनक अभिलाषा।
पिघलि गेल छल सुरुज मिझेलै
कुटिल अग्नि के अहं पिपाशा।
मौन भेल छल दिनकर नभ मे
नव आनंद अपार उठा क’।
चान भेल किछु लज्जित,हर्षित
उतरि गेल अपने ओरिया क’
............सतीश चन्द्र झा, मधुबनी

सोमवार, 11 मई 2009

नब कविता


सोनाक पिजरा

खौंइछा मे ल’ क’ दूभि धान।
पेटी, पेटार, पौती, समान।
जा रहल आइ छी सासुर हम
अछि कोना अपन लेए बेकल प्राण।

हमरा बिनु माय कोना रहतै।
बाबू केर सेवा के करतै।
नीपत चिनबार कोना भोरे
जाड़क कनकन्नी सँ मरतैं।

अछि केहन देवता के बिधान।
ल’ कोना जाइत अछि संग आन।
एखने उतरल छल साँझ पहिल
भ’ कोना गेल एखने विहान।

छल केहन अबोधक नीक खेल।
कनियाँ पुतरा मे मग्न भेल।
आमक टिकुला लय दौड़ि गेलहुँ
अन्हर बिहारि मे सुन्न भेल।

कखनो फूलक बनि रहल हार।
ल’ एलहुँ बीछि क’ सिंगरहार।
झूठक पूजा, माटिक प्रसाद
भरि गाम टोल देलहुँ हकार।

जे भेल मोन मे केलहुँ बात।
के रोकत जखने भेल प्रात।
भरि खौंछि तोड़ि क’ भागि एलहुँ
ककरो खेतक किछु साग पात।

ई समय कोना क’ बढ़ल गेल।
रहलहुँ हम सूतल निन्न भेल।
नहि भान भेल कहिया अपने
जीवन ओरिया क’ ससरि गेल।

बाबू सँ मा किछु केलक बात।
निशब्द इशारा उठा हाथ।
ल’ अनलथि जा क’ पिया हमर
ललका सिन्दुर पड़ि गेल माथ।

देखलहुँ पाहुन छथि अनचिन्हार।
निशिभाग राति सगरो अन्हार।
भेटल किछु नव श्पर्श पहिल
मन बहकि गेल उतरल श्रृंगार।

किछु सत्य भेल मोनक सपना।
भेटल मुँह बजना मे गहना।
हमहूँ देलियन्हि सर्वस्व दान
ई मोन हृदय जे छल अपना।

अछि केहन विवाहक ई बंधन।
स्नेहक संबंध बनल प्रतिक्षण।
अपरिचित दू टा चलल संग
विश्वासक बान्हल डोर केहन।

संगी साथी सभटा छूटल।
की बिसरि सकब जीवन बीतल।
ओ घर द्वारि आँगन दलान
सभ सँ छल स्नेह कोना टूटल।

कनिते कनिते औरियौन भेल।
पाहुन संग हमर चुमौन भेल।
भगबती घ’र सँ बिदा होइत
दू टा कहुना समदौन भेल।

दृग जल सँ गंगा उतरि गेल।
ममता विधान सँ हारि गेल।
बाबू दलान पर रहथि ठाढ़
मा ओलती मे निष्प्राण भेल।

खोंता मे पक्षी सिहरि गेल।
दाना अहार छल बिसरि गेल।
स्तब्ध भेल छल गाछ पात
पछबा बसात छल द्रवित भेल।

भारक समान किछु छल राखल।
भरि गाँव टोल सौसे कानल।
गामक सीमान धरि बहिना सभ
दौड़ल बताह भ’ छल कानल।

हम प्रात पहुँचलहुँ हुनक गाम।
जे अछि नारी केर स्वर्ग धाम।
नहि रहल एतय पहिलुक परिचय
भेटल हुनके सँ अपन नाम।

कोबर मे बैसल छी अनाथ।
राखथि जे बुझि क’ प्राण नाथ।
क’ देलक बिदा जखने परिजन
दुख केर कहबै किछु कोना बात।

बान्हल चैकठि सँ आब रहब।
दुख सुख कहुना अपने भोगब।
नैहरि सासुर केर मान लेल
कर्तव्यक सभ निर्वहन करब।

अछि उजड़ि गेल ओ पहिल वास।
भेटल अछि सोना कें निवास।
टुटि गेल पांखि, अछि भरल आँखि
पिजरा सँ की देखू अकाश।

शनिवार, 2 मई 2009

सोसाइटी फॉर कम्प्यूटर एजुकेशन सकिर्ल

सोसाइटी फॉर कम्प्यूटर एजुकेशन फ़ोन - 2236६८ मोबाइल - 9386258515

bimal chandra jhasatish chandra jhaLate Madhusudan jha

सोसाइटी फॉर कम्प्यूटर एजुकेशन
फ़ोन - 2236६८ मोबाइल - 9386258515
सोसाइटी फॉर कम्प्यूटर एजुकेशन फ़ोन - 2236६८ मोबाइल - 9386258515
मिथिलाक हृदय स्थली मधुबनी मे स्व0 राजीव गाँधीक सपना के साकार करय लेल एकटा संस्था 1993 मे खोलल गेल जकर उद्श्य गाम घरक युवा वर्ग के कम्प्यूटर शिक्षा द’ क’ देशक प्रगति मे जोड़बाक प्रयास छल। ई संस्थान छल सोसाइटी फाॅर कम्प्यूटर एजुकेशन सर्किल। एकर संस्थापक श्री बिमल चन्द्र झा आ सतीश चन्द्र झा छथि।ई संस्थान 1993 सँ आइ धरि अविरल धार जेंकाँ सब तरहक बाधा के पार करैत कखनो मंद त’ कखनो तेज गति सँ बहैत रहल अछि।एखन धरि एहि संस्थान सँ हजारो हजार युवा वर्ग कम्प्यूटर के उचित शिक्षा ग्रहण करैत नीक नीक पद पर कार्यरत छथि। एतय कम्प्यूटर क्षेत्राक बहुत रास शिक्षा देल जाइत अछि जे वर्तमानक परिपेक्ष मे उपयोगी होइक आ नव नव क्षेत्रा मे कम्प्यूटर के बढ़ि रहल मांग के पूरक सेहो होइक।ई संस्थान सत्त समाजक कमजोर वर्ग, महिला,विकलांग , हरिजन आदि के हितैसी बनल उचित सहयोग करैत रहल। एहि संस्थान के बैचारिक रूप सँ सहयोग करय बला किछु आदरणीय लोकनि सेहो याद अबैत छथि।
मधुसुदन झा
ग्राम + पो0 - नगवास,
जिला - मधुबनी

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

मोनक इच्छा

मोनक इच्छा
की देब पिया बाजू हमरा
एहि बेर अहाँ उपहार कहू।
प्रेमक निर्मल संसार बसल
की की करबै श्रृंगार कहू।
ज्ञानक सागर छी अहाँ पिया
हम मात्र ज्ञान के छी दासी।
अहाँ ज्योति धवल हम छी रजनी
प्रतिक्षण हम प्रेमक छी प्यासी।
प्रमक बंधन इ बनल रहय
कर जोडि़ देब लग विनय करू।
की देब पिया बाजू हमरा
एहि बेर अहाँ उपहार कहू।
अछि मोन पहिल जे भेट भेल
महिना छल अंत नवंवर के।
सजि एहन अहाँ एलौ, लागल
छथि कोनो देब इ अम्बर के।
माथक सिन्दुर नित रहय लाल
आशीश दिय॔ की आओर कहू।
की देब पिया बाजू हमरा
एहि बेर अहाँ उपहार कहू।
नहि लेब पिया एहिबेर कोनो
पायल, मुनरी, झुमका, कंगना।
अछि एक मात्र इच्छा मोनक
सुन्दर ललना खेलय अंगना।
कहिया आँचर मे नव श?शु के
गुँजत किलकारी आब कहू।
की देब पिया बाजू हमरा
एहि बेर अहाँ उपहार कहू।

रविवार, 19 अप्रैल 2009

भ्रमित शब्द

सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र
समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।

भ्रमित शब्द

हेरा गेल छल हमर शब्द किछु
फेर आइ घुरिया क’ आयल।
बास भेलै नहि कतौ जगत मे
थाकि हारि क’ अपने आयल।
नुका गेल सब रही नीन्न मे
मोनक कागत सँ उड़िया क’।
केना ? कखन ? सब के ल’ भगलै
आन - आन भाषा फुसिया क’।
आतुर मोन उचटि क’ ताकय
बैसल बाट दूर धरि कखनो।
राति बिराति द्वार के खोलत
छी जागल अबेर धरि एखनो।
पसरल देखि हमर निर्धनता
भागि गेल छल सब उबिया क’।
खोजि रहल छल सुख जीवन केँ
भोग वासना मे बौआ क’।
अर्थ बाँटि सम्मान समेटब
छलै मोन मे इच्छा जागल।
मान प्रतिष्ठा के इजोत मे
भ्रमित भेल सबटा छल भागल।
शब्द अभागल चीन्हि सकल नहि
हम बताह कवि छी वसुधा मे।
बिसरि जाइत छी हम जीवन भरि
की अंतर छै गरल - सुधा मे।
नहि अछि लोभ अर्थ के हमरा
नहि चाही सम्मान जगत के।
निज भाषा केँ स्नेह,कलम सँ
निकलत धार रत्त अमृत के।
हम कविता सँ दिशा दैत छी
दृष्टिहीन व्याकुल समाज के।
जगा रहल छी जे अछि सूतल
गीत गावि क’ बिना साज के।
नहि छपतै कविता जनिते छी
पत्रा पत्रिाका के पन्ना मे।
छपतै नग्न देह नारी के
मुख्य पृष्ट ,अंतित पन्ना मे।
मुदा केना हम कलम छोड़ि क’
मौन भेल आँगन मे बैसू।
केना हेतै किछु व्यथा देखि क’
द्रवित मोन मे नहि किछु सोचू।
कोमल हृदय अपन अंतर सँ
प्रतिक्षण आगि उगलिते रहतै।
पढ़तै कियो लोक नहि तैयो
कलम हाथ केँ चलिते रहतै
अपन टीका-टिप्पणी दिअ।

शनिवार, 18 अप्रैल 2009

ध्यान
बहुत कठिन अछि प्र्रसन , कहब जीवन छै क्र्रंदन।
भेटत किछु प्रतिदान जेना करबै अभिनंदन।
जतेक पानि पड़तै, गाछो सब ओहिना बढ़तै।
भेटतै रौद ससरि क॔ लत्ताी फत्ताी चढ़तै।
करबै जतेक संकुचित मोनक अपन सोच के।
करत ग्रसित ओतबे दुख पीड़ा अपन सोच के।
उठत डेग जे कर्म करब ओहिना फल भेटत।
ब्लॉगकेँ डिजाइन बिमल चंद्र झा द्वारा कएल गेल अछि !
 
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मिथिलाक बात मिथिलाक पवित्र भूमि मधुबनी सँ प्रकाशित